Wednesday, April 29, 2009

ग़ज़ल

गज़ब का हुस्नो शबाब देखा
ज़मीन पर माहताब देखा
खिजां रसीदा चमन में अक्सर
खिला-खिला सा गुलाब देखा
किसी के रुख पर परीशान गेसू
किसी के रुख पर नकाब देखा
वो आए मिलने यकीन कर लूँ
की मेरी आँखों ने खवाब देखा
न देखू रोजे हिसाब या रब
ज़मीन पर जितना अजाब देखा
मिलेगा इन्साफ कैसे " अलीम"
सदकतों पर नकाब देखा

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--- संजय सेन सागर

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