Thursday, April 9, 2009

पाकिस्तानी हैं तो निपटा दो?

विवेक अवस्थी
सीनियर एडिटर,IBN7
भारत की औद्योगिक राजधानी पर 26/11 के आतंकी हमले के बाद एक आम भारतीय फिर चाहे वो अमीर हो या गरीब, पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, उसकी सोच में एक बड़ा बदलाव आ चुका है। इस हमले ने हमारे अंदर आतंकवाद के खिलाफ एकसाथ खड़े होने का भाव पैदा किया है। देशभक्ति की भावना हरेक में फिर से आ चुकी है चाहे वो बच्चा हो, जवान हो या फिर बूढ़ा़। वास्तव में यह देखना काफी अचंभा पैदा करने वाला है कि हम लोगों में एक लंबे समय बाद भारतीयता का बोध पैदा हो रहा है जो कि इससे पहले सिर्फ साल के दो दिन 26 जनवरी और 15 अगस्त तक ही सीमित रहता था।


यही वो समय है जब एक गलत सोच धीरे-धीरे हमारे सिस्टम में शामिल होती जा रही है। 26/11 के बाद हमारी पुलिस को लगता है जैसे कि हत्याएं करने का लाइसेंस मिल गया है। यह उदाहरण उत्तर प्रदेश की एंटी टेररिस्ट स्कवॉड के निर्दयी चेहरे को उजागर करता है जोकि अबतक आतंकियों के बजाए अपराधियों के खिलाफ सालों से कार्रवाई करने में संलग्न थी। अब यह समय उनके लिए अपनी काबिलियत साबित करने का है इसलिए एनकाउंटर जरूरी हो जाता है। पाकिस्तानी आतंकावादियों का एनकाउंटर होता है और फिर शुरू होता है यूपी पुलिस का ऑपरेशन 'क्रिएट टेररिस्ट'


25 जनवरी को देर रात मीडिया के लोगों के पास एक मैसेज आता है कि नोएडा के सेक्टर 97 में एके-47 रायफल, हथगोलों से लैस दो पाकिस्तानी आतंकवादियों की यूपी पुलिस और एटीस की भिड़ंत हुई है। इसमें दोनों आतंकी मारे गए। मीडिया मौके पर पहुंची लेकिन 'मौन' रही, राष्ट्रीयता के नाम पर सवाल कहीं दब गए। मालूम हो कि जहां पर यह एनकाउंटर हुआ यह वही जगह है जहां पर पिछले 3 महोनों में 5 एनकाउंटर हो चुके हैं। क्या यह देश में अपराधियों के लिए एक बरमुडा ट्राइएंगल (वह जगह जहां जाकर कई जहाज और पोत गुम हो गए) है।


जो स्टोरी एटीएस ने बताई वह काफी सवाल खड़े करने वाली और रोचक है। जिसके मुताबिक पाक आतंकी मारुति 800 में पहली बार गाजियाबाद के लाल कुआं में देखे गए जहां उनसे रुकने को कहा गया लेकिन कर सवाल नहीं रुके। उनका नोएडा के सेक्टर-97 तक पीछा किया गया जहां यह उनकाउंटर हुआ। मालूम हो कि लाल कुआं से सेक्टर-97 तक की दूरी मात्र 15 किलोमीटर की है। सवाल ये है कि इस बीच कोई एक भी बैरीकेड या पिकेट नहीं पड़ा या फिर एटीएस चाहती थी कि एनकाउंटर नोएडा के सेक्टर-97 मे ही हो!


यह एनकाउंटर 2 पाक आतंकियों की हत्या के बाद 1 मिनट के अंदर ही शुरू होकर खत्म भी हो गया। एक तरफ जहां आतंकी एके-47 लिए थे वहीं एटीएस वाले कुछ पिस्टल और राइफल लेकर उनसे मुकाबला कर रहे थे! 26/11 के बाद यह बात साफ हो चुकी है कि जो बुलैट प्रूफ जैकेट सुरक्षा बलों को मिली हैं वह गोलियां रोकने में सक्षम नहीं हैं खासतौर से एके सीरीज के हथियारों से निकली गोलियां। पिस्टल और रायफल से एके-47 का मुकाबला करना वास्तव में एटीस के लिए एक जांबाजी भरा कदम माना जा सकता है!


एनकाउंटर के बाद एटीएस ने बड़े गर्व से मारे गए आतंकियों से बरामद हथियारों को दिखाया। लेकिन एटीएस को कुछ और सबूतों को दिखाना होगा और कुछ संदेह दूर करने होंगे उन्हें पाकिस्तानी नागरिक ठहराने के लिए। इन लोगों से दो पाकिस्तानी पासपोर्ट बरामद हुए जो कि मीडिया को बताया गया। इसमें शक पैदा करने वाली बात ये है कि एटीएस यह कह रही है दिल्ली में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए यह आतंकी जा रहे थे। अगर ऐसा है तो वे अपने पासपोर्ट साथ क्यों ले जा रहे थे? इस सवाल में ही उसका जवाब छिपा है। गौर करने वाली बात यह कि जिस रास्ते पर ये जा रहे थे वह रास्ता दिल्ली की ओर जाता ही नहीं है।


बताया गया कि इस एनकाउंटर में पुलिस पार्टी की ओर से एक कॉस्टेबल विनोद घायल हुआ है जिसे नोएडा के एक प्राइवेट हॉस्पीटल में भर्ती कराया गया है। इस तथ्य के बाद कि गोली उसके पैर को छूती हुई निकल गई है किसी को भी उससे मिलने नहीं दिया जा रहा। क्या वास्तव में वह गंभीर रूप से घायल है, कोई भी इस बात को समझना चाहेगा कि आखिर क्यों यूपी एटीएस द्वारा उसे लगातार अलग रखा जा रहा है।


एनकाउंटर में शामिल पुलिस की जिप्सी (गाड़ी नं- UP-16K 0895) के विंड स्क्रीन में गोली का छेद बना हुआ है। पुलिस के मुताबिक आतंकियों ने उनके वाहन पर गोली चलाई जवाबी कार्रवाई में वे भी मारे गए। इसमें चौंकाने वाली बात यह है कि यह छेद कुछ इस तरह से हैं कि यह गाड़ी चलाने वाले के सर और छाती के बीच में आता है लेकिन पुलिस पार्टी से कोई घायल नहीं हुआ। दूसरी ओर अगर फायर हुआ तो वह सीट में घुसता लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ इससे यह संदेह होता है कि गोली कहीं अंदर से तो नहीं चलाई गई।


यूपी के आला पुलिस अफसरों ने जल्दबाजी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने लोगों को इस जांबाजी के लिए बधाई भी दे डाली। उनके बयान के मुताबिक आतंकियों को वहां रुकने के लिए मजबूर किया गया बाद में एटीएस टीम ने उनकी गाड़ी को सफलतापूर्वक पंचर कर दिया। पर मजेदार बात यह है कि जो कार मौके पर मिली उसके टायर में किसी गोली का निशान नहीं है। ऐसा लगता है कि बाद में उसके ट्यूब से हवा निकाली गई।


मारे गए लोग कौन थे? उनका पुराना ट्रेक रिकॉर्ड क्या था? क्या वे इससे पहले किसी आतंकी गतिविधि में संलग्न थे? क्या वे वांछित थे? अगर हां, तो किस अपराध के लिए? यूपी पुलिस में किसी के पास इन सवालों के जवाब नहीं थे। सिर्फ एक ही जवाब उनके पास है कि जांच चल रही है। खैर, मामले की जांच चल रही है और इस केस में शामिल रही एटीएस टीम को बहादुरी पुरुस्कार, प्रमोशन आदि देने की तैयारी भी जारी है।


इसमें सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि 26/11 के बाद भारतीय की सोच में बदलाव आया है कोई भी इस पर एक सवाल तक नहीं करना चाहता। भारत में तथाकथित मानवाधिकार के पैरोकार-कई संगठन इस मसले पर पुरी तरह चुप्पी साधे बैठे हैं जो कि पुलिस की ज्यादतियों पर विगत में काफी हो हल्ला मचाते रहे हैं सिर्फ इसलिए कि मारे गए दोनों पाकिस्तानी थे? यह सच है कि हम देशभक्त और सच्चे भारतीय है लेकिन क्या इसका ये यह अर्थ है कि हम अपने देश की गलियों में खून बहने दें और लोग मारे जाते रहें सिर्फ इसलिए क्योंकि उनकी राष्ट्रीयता अलग थी और हम अपने यहां कानून अनुपालन के सवाल भी न करें?
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6 comments:

  1. विवेक जी का लेख पढ़कर अच्छा लगा
    काफी सुन्दर लिखा है

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  2. मैं आपकी बातों से काफी हद तक सहमत हूँ...!आंतक वादिओं के प्रति आई जागरूकता और आक्रोश को पुलिस अपनी ढाल बनाने में जुटी है...!लेकिन एक लोकतान्त्रिक देश में इस तरह की मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती..!इसे कटाई जायज़ नहीं माना जा सकता..!ये तो देश के जज्बे से भी खिलवाड़ हो रहा है..इसकी निंदा होनी ही चाहिए...

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  3. क्या किया जाये पकिस्तान की फितरत ही ख़राब है
    अच्छा लेख

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  4. ये तो अभी आगाज है ..अंजाम बाकी है.
    काफी सुन्दर लिखा है....

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  5. bahut achcha likha. yahi hal batla house encounter ka hai jisme do muslims larko ko atankwadi batakat mar dala gaya wo bhi blast ke fauran ke bad.

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  6. एक बार फिर पुलिस को कटघरे में रखने की कोशिश... घर पर बैठकर बाल की खाल निकालनेवाले इतने ही काबिल हैं तो किसी मौके पर बिना गोली चलाये किसी अपराधी या आतंकी को पकडें. मानव अधिकार सिर्फ अपराधियों का नहीं होता. अमनपसंद लोगों की जिन्दगी बचने के लिए पुलिस को वह सब करना ही चाहिए जो जरूरी है. उस समय सोचने और तर्क करने के लिए एक पल भी नहीं होता. करो या मरो... मीडिया का एक ही काम है पुलिस पर कीचड उछालो... नाम पाओ... गेहूं के साथ घुन भी पिसता ही है... पुलिस अपनी सूचना या शक पर कार्यवाही न करे तो लोगों का जीना मुश्किल होगा... तमाम कोशिशों के बाद भी प्रेस के गैर जिम्मेदार रवैये के कारन मुंबई में और अन्यत्र भी पुलिस की मुश्किलें बढीं...काबिल और बहादुर अफसर मारे गए... मीडिया का विवेक कब जागेगा?, कब तक कानून के रखवालों को गुनाहगार बताने का फैशन चलेगा?, काम के दौरान गलती होना कुदरती बात है... ऐसा होने पर विभाग जांच कर दंड भी देता है... पर हर बार बिना पुख्ता सबूतों के सिर्फ पब्लिसिटी के लिए... ? सोचिये...बदलिए...जागिये...

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