Sunday, April 5, 2009

दोहे : आचार्य संजीव 'सलिल'

आरक्षण ने कर दिया, नष्ट स्नेह-सद्भाव।
राजनीति विष-वल्लरी, फैलाती अलगाव।।

प्रतिभाएं कुंठित हुईं, बिन अवसर बेचैन।
सूरदास ज्यों फोड़ते, मृगनयनी के नैन॥

आरक्षण धृतराष्ट्र को, पांडव को वनवास।
जब मिलता तब देश का , होता सत्यानास॥

जातिवाद के नाग का, दंश बन गया मौत।
सती योग्यता को हुई, जाट तवायफ सौत॥

हीरा पड़ा बजार में, कांच हुआ अनमोल।
जन-सेवा वृत्त-तप गया, सत्ता-सुख-लाख दोल। ***********

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--- संजय सेन सागर

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