Saturday, April 18, 2009

एक शे'र: आचार्य संजीव 'सलिल'

इन्तिज़ार दिल से करोगे जो पता होता.
छोड़कर शर्मोहया मैं ही मिल गयी होती.

1 comment:

  1. वाह ! आचार्य जी की रचनायें पढ़ने का एक अपना सुकून है ।
    और यह शेर तो लाजवाब है ।

    ReplyDelete

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...