Friday, April 10, 2009

कोई तो देखों हमारी और

अनायास ही मन छोटे शहरों की अव्यवस्थाओं को देखकर अक्सर व्यथित हो जाता है।फिर बात अपने गृहनगर की हो तो टीस तो उठती ही है। जब भी अपने गृहनगर भिण्ड़ जाती तो कुछ कुछ ऐसा देखती हूँ जो मन को दुखी कर देता है। चलो आज आपको अपने ग्वालियर शहर से भिण्ड़ की यात्रा का वर्णन सुनाती हूँ।
धटना थोड़ी पुरानी है लेकिन सफर की अव्यवस्थाये अपना चोला कभी नहीं बदलती। बात जनवरी माह के अन्तिम सप्ताह की है। जब में किसी की शादी मैं सरीक होने अपने गृहनगर जा रही थी बड़े उत्साहित मन से हम टिकिट खरीद ट्रेन मै जाकर बैठ गये टिकिट खिड़की पर ज्यादा भीड़ भी नही थी इसलिए कोई परेशानी भी नही हुई। मन मैं अलग अलग ख्यालों को लेकर मैं अपने घर और हमारी ट्रेन अपने अगले स्टेशन की ओर चल दी। अरे ये क्या कुछ पल बितते ही ग्वालियर का अगला स्टेशन बिड़ला नगर गया। स्टेशन पर होते शोर ने बिचारो की तन्द्रा को तोड़ दिया। अब चलाए मान मन कंहा एक जगह टिक सकता है तो अपनी जिज्ञासा को शान्त करने खिड़की के बाहर तो देखना ही था। बाहर जमा भीड़ को देखकर लगा जैसे कोई दुर्घटना हुई है पर मै गलत थी। अगले ही पल क्या देखती हूँ कि भीड़ छटकर अलग अलग डिब्बों में चढ़ गई है। हमारा डिब्बा जो पहले से हीे करीब करीब पूरा भरा हुआ था उसमें भी करीब तीस चालीस लड़के घुस आये अब नीचे तो बैठने को जगह थी नहीं सो वे सभी उपर वाली एक एक बर्थ पर चार चार पाँच पाँच लड़के बैठ गये। और देखते ही देखते डिब्बे मैं शोर शराबा होने लगा लोगों के मुख से निकलने निकलने बाले शब्द मेरे कानो तक पहुचने से पहले ही आपस मै टकराकर उन उलझे हुए धागों कि तरह हो गये थे जिनमे से किसी एक को सीधा समझ पाना मुशकिल होता है। थोडी कोशिश के बाद उनकी बातों से समझ आया कि वे सभी फौज में भर्ती के लिए आये थे उनमे से कोई भी सभ्य और शिक्षित प्रतीत नहीं हो रहे थे। उन सभी के जोशभरे अंदाज को देखकर जरूर लग रह था कि युवा खून में बाकई गर्मी होती है। सभी लड़को ने हमारा साथ भिण्ड तक दिया। हाँ एक खाॅस बात ओर बताती हूँ भिण्ड ग्वालियर के बीच चलने वाली कोटा पैसेन्जर का कोई भी सवारी कभी भी अपनी सुबिधा के अनुसार चेन खीचकर रोकने की खुली छूठ रखता है। क्योंकि यहाँ तो जुर्माना लगने से रहा। मै जितनी बार भी भिण्ड़ आती ये समस्या तो अक्सर पाती ही हूँ। सो इस बार भी कहां इस समस्या से अछूती रहती स्टेशन के नजदीेक आते ही कुछ लड़को चैन खीचं ही दी और सभी लड़के रोड से भाग निकले। ट्रेन अभी चल भी नहीं पाई थी कि फिर से किसी ने चैन खींच दी। इस तरह इन बिना टिकिट यात्रियों ने ट्रेन मैं बैठे अन्य यात्रियों को जबरन 20 मिनिट इन्तजार करने पर मजबूर कर दिया।
जारी ................

1 comment:

  1. aise bhind murenaa kayee pradeshon main hain .ghoomte rahiye dhoondne ki jaroorat nahin rahegi.jhallevichar.blogspot.com

    ReplyDelete

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...