Tuesday, April 7, 2009


फिर भी हम चिल्लाते , अपना गाल बजाते
जब -जब देश मैं गलत का फैलाव हुआ ,हमारा अपनी जमीर से अलगाव हुआ ।
बेचा खुद के अहसासों कोचांदी की टुकडो के खातिर ,
गरीबो के पैसों से शेयरबेचते बाजार के शातिर ।
हल्का से एक झटका लगाबड़ा पेड़ कट कर गिरा ,
हमारी अर्थ जगत की चूल हिल गईगुरु की गुरुतई काम न आई ।
तब चेलो की की कैसी प्रभुताई !
फिर भी हम चिल्लाते ,अपना गाल बजाते ।
देश के चंद अमीरों में ,खुद को आमिर जतलाते ।
सोने को जमीं के लाले चाँद पे जाने का गौरव गाते ।
खाने को अन्न नहीं पर ,अरबों में नेता चुन कर लाते ।
धन्य हमारा लोकतंत्रहै धन्य हमारा देश स्वतंत्र !
है धन्य हमारी जनता !हैं धन्य हमारे नेता !
अब , बस बहुत हो चुका अब भी जागो युवा ,जगाओ अंदर का शिवा ।
खोलो मन के द्वार हो जाने दोएक बार फिर इस जग का उद्धार ।

10 comments:

  1. बहुत बढ़िया लिखा है

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--- संजय सेन सागर

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