Friday, April 3, 2009

अशार

अश'आर

आचार्य संजीव 'सलिल'

जब तलक जिंदा था, रोटी न मुहय्या थी।
मर गया तो तेरही में दावतें हुई।

पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों।
मैं ढूंढ-ढूंढ हारा, घर एक नहीं मिलता ।

बाप की दो बात सह नहीं पाते।
अफसरों की लात भी परसाद है।

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3 comments:

  1. सच असलियत बंया की एक गरीब की जिंदा रहने पर रोटी नहीं मिलती और मरने पर दाबत
    बहुत खूब लिखा

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  2. इतना अच्छा लिखा है की मैं कुछ भी नहीं कह सकती

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  3. प्याशे को पानी पिलाया नहीं बाद अमृत पिलाने से क्या फायदा

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--- संजय सेन सागर

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