Wednesday, March 25, 2009

नवजवान मिल्लत से guzaarish

यह मेरी आज़िजाना है तहरीक दोस्तों
जाओ न खुराफात के नज़दीक दोस्तों
थोडी सी गैरत है तो मांगो न तुम दहेज़
लेना न जोड़े घोडे की तुम भीक दोस्तों
तुम ख़ुद कम के ऐश करो , मर्द हो अगर
वरना करेगी बीवी भी तजहीक दोस्तों
फर्सूदा रस्मों रवाजो को छोड़ दो
अपने माशरे को करो , ठीक दोस्तों
उन बिन बियाही बहनों को देखो ज़रा जिनकी
है ज़िन्दगी अजीरण वो तरीक दोस्तों
इश्वर और उसके उसके एह्काम पर चलो
यह मेरी आजिजाना है तहरीक दोस्तों

1 comment:

  1. हुज़ूर आदाब !
    बहुत ही नायाब पैगाम दिया है आपने अपनी इस
    खूबसूरत ग़ज़ल के हवाले से ..
    लफ्ज़-दर-लफ्ज़ हकीक़त से मुलाक़ात ...
    मुबारकबाद कुबूल फरमाएं ...
    और ये आपकी खिदमत में

    "जिद्दत के साथ-साथ रहो कोई ग़म नहीं
    रस्मों की भी निभाते चलो लीक दोस्तों.."

    ---मुफलिस---

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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