Sunday, March 29, 2009

ghazal

इन्केलाब आया ज़माने में ये कैसा यारों
आज हर शख्श नज़र आता है तनहा यारो
लाख मजबूर करे उसको ज़माना यारों
वोह मुझे छोड़ दे तनहा नही ऐसा यारो
मुस्कुराने की सज़ा ऐसी मिली है मुझको
रात दिन करता हूँ हसने से मैं तौबा यारो
दिल में खुद्दारी का फैजान रहा है जब तक
एक कतरा भी समंदर से न माँगा यारो
गुफ्तगू नूर भी चेहरे का उदा देती है है
बात करने का अगर हो न सलीका यारो
वो मेरे शहर से कह कर येही दुनिया से गया
खौफो दहशत से न हिजरत कभी करना यारो
हाँ येही अश्क निदामत है मेरा हासिल जीस्त
हाँ येही मेरे मुकद्दर में लिखा था यारो।
अलीम आज़मी

2 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है आपने

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  2. tareef ke liye aapka bahut bahut shukriya kalpana ji

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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