Friday, March 20, 2009

तेवरी

आचार्य संजीव 'सलिल'

खोटे सिक्के हैं प्रचलन में.
खरे न बाकी रहे चलन में.

मन से मन का मिलन उपेक्षित.

तन को तन की चाह लगन में.

अनुबंधों के प्रतिबंधों से-

संबंधों का सूर्य गहन में.

होगा कभी, न अब बाकी है.

रिश्ता कथनी औ' करनी में.

नहीं कर्म की चिंता किंचित-

फल की चाहत छिपी जतन में.

मन का मीत बदलता पाया.

जब भी देखा मन दरपन में.

राम कैद ख़ुद शूर्पणखा की,

भरमाती मादक चितवन में.

स्नेह-'सलिल' की निर्मलता को-

मिटा रहे हम अपनेपन में.

* * * * *

समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाऊन, जबलपुर ४८२००१
vaartaa : ०७६१-२४१११३१, चलभाष: 0९४२५१ ८३२४४ई मेल: सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम, ब्लॉग: संजिवसलिल.ब्लागस्पाट.com

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--- संजय सेन सागर

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