Friday, March 20, 2009

मुस्लिम खुद को बदलें,हम उनकी तकदीर बदल देंगे

मुस्लिम मतदाता कुछ नहीं सोच सकता क्योंकि उसे इस देश के बारे मे सोचने का समय ही नहीं है,असलियत यही है की भारत का मुस्लिम,भारत मे रहकर भी,पकिस्तान की दलाली करता और भारत कही पकिस्तान पर हमला न कर दे,अल्लाह से इसी की दुआ मांगता रहता है!लेकिन इन धोखेबाजों की कौन बताये की यह देश तुम्हारे सहारे के लिए नहीं तड़प रहा है,इस देश ने तुम लोगों को क्या नहीं दिया! फिर भी दिल मे इस देश के प्रति जरा भी इज्जत नहीं है!अगर ऐसा नहीं होता तो -तो तुम लोगों को वन्देमातरम गाने मे क्या दिक्कत है अगर ऐसा नहीं होता तो क्या सारा हिन्दुस्तान तुम से नफरत क्यों करता,इस देश मे ईसाई भी है उनसे तो कोई नफरत नहीं करता ! मतलब सीधा है आप लोगों की फितरत ही दगावाजों की है! आप लोगों को कुछ बदलने की जरुरत नहीं है बस जरुरत है तो खुद को बदलने की
अम्बरीश अग्निहोत्री आगरा


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6 comments:

  1. भारत में 80 प्रतिशत से से अधिक गैर मुस्लिम हैं यानि ज्यादातर हिन्दू हैं, मुसलमानों ने भारत पर लगभग 1000 साल तक शासन किया यदि वे चाहते तो एक एक करके गैर मुस्लिम को इसलाम स्वीकार करने पर मजबूर कर देते क्यूँ.....क्यूंकि उनके पास शक्ति थी ! आज हिन्दोस्तान में 80 प्रतिशत से से अधिक गैर मुस्लिम हैं जो इस तथ्य के गाह हैं कि इस्लाम एक अच्छा धर्म है और उसके अनुनायी (मुसलमान) अच्छे इंसान !!!!

    कहाँ हैं आप, अम्बरीश भाई !!

    आपका
    सलीम

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  2. के गाह हैं कि इस्लाम एक अच्छा धर्म है और उसके अनुनायी (मुसलमान) अच्छे इंसान !!!!

    नया तरीका पता चला अच्छा इन्सान बनने का, इस्लामिक देशों में तो अपराध और जेलें तो होती ही नहीं होंगी? सभी खून खराबे से, जोर ज़बरजस्ती वाले तरीकों पर विश्वास नहीं करते होंगे, सभी दया और एक दूसरे के प्रति प्रेम की भावना से सराबोर होंगे. यानि की स्वर्ग होते होंगे मुस्लिम देश!!!


    अगर इतने ही सहनशील और शांतिप्रिय हैं तो अरब में इसलाम पूर्व संस्कृति के कोई निशान नहीं मिलते, कोई बुत नहीं छोड़ा, क्यों? कश्मीर, ईरान और अफ़गानिस्तान कभी बौद्ध और हिन्दू संस्कृति का गढ़ थे, अब वहां प्राचीन मंदिरों और मठों के अवशेष तक नहीं बचे, क्यों? वैसे बचे तो वहां गैरमज़हबी भी नहीं?सारे खाड़ी(अरब), उत्तरी अफ्रीका, मध्य एशिया में दूसरे धर्माविलंबी हैं ही नहीं, सभी ने तो स्वेच्छा से इस्लाम अपनाया नहीं होगा , अगर इसमें स्वेच्छा होती तो वर्तमान भारतीय गैरमुस्लिम बेवकूफ हैं जो अब तक मुसलमान नहीं बने? क्यों हमें आज इस्लामिक देशों में इस्लामपूर्व संस्कृति के कोई निशान बाकी नहीं मिलते?

    यार, क्यों भारत के ही लोग इतने मूर्ख हैं की वे इस्लाम नहीं अपना रहे? और वो भी सिर्फ भारत के, वर्ना अरब, इरान, मध्य एशिया, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, कश्मीर में सब के सब जीनियस, की हर कोई मुसलमान हो गया? किसी भी समाज में एक हिस्सा तो होता ही है जो पुरानी संस्कृति से चिपका रहना चाहता है, चिपका भी रहता है पीढी दर पीढी, क्या वहां के सारे लोग एक ही वक्त में इस्लाम के इतने मुरीद हो गए? वाह भाई

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  3. आपका कहना ठीक है, किसी ना किसी को पुरानी चीज़ों से जुड़े रहना चाहिए,

    सवाल नंबर एक- क्या आप दुनियाँ के सबसे पुराने ईश्वरीय ग्रन्थ वेदों की से जुड़े हुए हैं?

    सवाल नंबर दो-अगर जुड़े है तो क्या इसके ब्रह्म सूत्रं (एहम ब्रह्म द्वितीयो नास्ति-ऋग्वेद ) और यजुर्वेद में लिखा (ना तस्य प्रतिमा अस्ति) पर अमल करते हैं?

    सवाल नंबर तीन- क्या आप वेदों में लगभग सत्तर बार ज़िक्र है, कल्कि अवतार के आने की, जिसके आने की पूरी दास्तान आपने वेदों से पढीं हैं? मैंने पूछा वेदों से पढीं है?

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  4. मैं वेदों को नहीं मनाता, मेरे मज़हब का बड़ा हिस्सा मानता है, पर किसी भी हिन्दू के लिए कोई बाध्यता नहीं है की वह वेदों या रामायण या सारे उपनिषदों को माने ही. हिन्दुओं के के दर्शनों में एक नास्तिक दर्शन भी है, तो मैं उसी पर विश्वास करता हूँ. आप हिन्दू होकर भी कह सकते हैं की आप नास्तिक हैं, संशयवादी हैं, या मूर्तिपूजा में आपका विश्वास नहीं है, और यही बात इसे सबसे अलग करती है.

    यह संभव नहीं की आप खुद को बौद्ध कहें और भगवान् बुद्ध व धम्मपिटक को ताल ठोक कर नकारें, या खुद को ईसाई घोषित कर के बाइबिल के अस्तित्व को नकारें, या .............. पर चूँकि हिंदुत्व एक धर्म न होकर व्यापक जीवनशैली है तो हर एक हिन्दू यह तय कर सकता है की उसका व्यक्तिगत धर्म क्या हो, वह किस शास्त्र, किस देवता पर श्रद्धा रखे, रखे भी या नहीं, उसपर निर्भर है. मैं वेदों या रामायण से अधिक गीता पर श्रद्धा रखता हूँ, और ज़रूरी नहीं समझता की कोई वेदों को ही अंतिम सत्य माने, या किसी भी पुस्तक को अंतिम सत्य माने. और जो मानना चाहे उसपर रोक भी नहीं है, शौक से सारे कर्मकांड और पूजा-पाठ करे.

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  5. हमें इस लेख से काफी कुछ कहने का मौका मिला है मेहेरबानी करके आप सभी बुरा नहीं मानना मुस्लिम हमेशा से ही वतनपरस्त रहा है हर तबके में कुछ न कुछ लोग ऐसे होते है जो गद्दार किस्म के होते है चाहे वो मुस्लिम हो हिन्दू हो ईसाई हो या कोई भी हो, लेकिन अगर हम सभी को ऐसा कहेंगे तो हमारे सोचने और समझने की अकल ख़त्म हो गयी है और हम में नफरत नाम की गन्दी चीज़ उत्पन्न हो चुकी है इसलिए किसी एक के मध्यम से सभी गलत तेहरान बिलकुल जायेज़ नहीं है , हम आपको बता दें इस्लाम हमेशा से ही वतनपरस्ती को जयेज़ ठहराया है देश से मोहब्बत रखना ही सबसे बड़ा सवाब है तो फिर आप हमें बताएं की मुसलमान कहा से दलाल हुवे ,हुज़ूर हमे अपनी गन्दी सोच के उपज को मरना होगा, और सच्चे मन से आपसी तालूकात को बनाना होगा नहीं हम युवा जो इस देश के रोशन करने वाले चिराग है नफरत की आग में भस्म हो जायेंगे मेरी आप सभी से निवेदन है आपसी भाई चारा को बनाएं रखने में बढ़ चढ़ कर अपना योगदान करें ..............शुक्रिया..

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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