Tuesday, March 24, 2009

ग़ज़ल

शक की बरसात अगर यूँ ही मुसलसल होगी
ये ग़लतफ़हमी किसी तरह नही हल होगी
बा हया लड़की की खामोशी इन फूलों में
यह हवा भी किसी दो शेजः का आँचल होगी
वक्त की अपनी कोई खुशबू कहाँ होती है
रात सुलगे गी बदन पर तभी संदल होगी
अतर की शीशी लिए चाँद करीब आया था
क्या मुझे इल्म था वोह ज़हर की बोतल होगी
रेग्जारों की तरह है मेरी पलकों पर बीछि
ज़िन्दगी तेरे लिए ख्वाब कल मखमल होगी
मिल चुका सबसे गले फिर भी अधूरा सा हूँ
तुम मिलोगे तो मेरी ईद मुकम्मल होगी
दिल के सन्नाटे पर अब आने वाला ज़वाल
इस खान्दर में कोई एक बारगी हलचल होगी
कह रहा है मेरा दिल कुछ होने को है अलीम
यह मोहब्बत की कशिश मेरी जानिब होगी ।


2 comments:

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--- संजय सेन सागर

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