Friday, March 27, 2009

मुक्तक -- आचार्य संजीव 'सलिल'


पुस्तकें मिलने-मिलाने का बहाना हो गयीं.
आए कासिद या न आए वो फसाना हो गयीं.
दूरदर्शन या कि अंतरजाल में दूरी 'सलिल'-
जो चली पुस्तक लिए वो ख़ुद निशाना हो गयी.

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हुस्न-ओ-इश्क की बातें न करो ऐ जानम!.

ताज में अब न मोहब्बत के फूल खिलते हैं.
बोलते बम रहे शिव जी के भक्त आज तलक-
ताज में आजकल शव और बम ही मिलते हैं.

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बहाते हैं जो लहू रोज़ बेकसूरों का.

लहू उनका भी रोज नालियों में बहता है.
जो टूटता है उसे फ़िर बना लेता है 'सलिल'-
जालिमों का कभी नामो-निशान न रहता है.

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1 comment:

  1. संजीव जी बहुत खूब
    सीधी दिल में उतरती है आपकी रचनाये !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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