Monday, March 23, 2009

ग़ज़ल

मौसम की तरह रंग बदलते हुए देखा
इंसान को कई रूप में ढलते हुए देखा
टा उम्र जिसे ज़हर उगलते हुए देखा
उस के लिए ही दिल को मचलते हुए देखा
उल्फत भरी बातों से मोहब्बत की कशिश से
पत्थर को कई बार पिघलते हुए देखा
बेटे की तबस्सुम को जवान रखने की खातिर
एक मान को कड़ी धुप में जलते हुए देखा
नफरत की हवाओं ने बुझा डाला उसको
जिस शमा मोहब्बत को था जलते हुए देखा
पैरों tale जालिम के चमन जार में हम ने
हर गाम पे कलियों को मसलते हुए देखा
दौलत पे जिसे नाज़ था उस शख्श को अलीम
हम ने कफे अफ़सोस है मिलते हुए देखा।

2 comments:

  1. मान्यवर आपने बहुत ही अच्छी कहाँ की गजल कही है
    ख़ास कर मतला व 4 शेर
    मगर इतनी अच्छी गजल पढने में लय की कमी खल रही है क्योकी गजल बहर में नहीं है

    गजल व बहर के विषय में कोई भी जानकारी चाहिए हो तो सुबीर जी के ब्लॉग पर जाइये
    www.subeerin.blogspot.com
    आपका वीनस केसरी

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  2. mere pyare vinus ji abhi hum itne maharathi nahi shairo shari me lekin hum koshish kar rhe hai aap sabhi ke saamne ek achi gazal pesh karein aapne hausala afzai ki hai uske liye aapka hum dil se ada karte hain

    ReplyDelete

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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