Tuesday, March 24, 2009

मुक्तक : दोस्त

संजीव 'सलिल'



दोस्त हैं पर दोस्ती से दूर हैं.
क्या कहें वे आँखें रहते सूर हैं.
'सलिल' दुनिया के लिए वे बोझ हैं-
किंतु अपनी ही नजर में नूर हैं.
***************************
दोस्त हो तो दिल से दिल मिलने भी दो.

निकटता के फूल कुछ खिलने भी दो.
सफलता में साथ होते सब 'सलिल'-
राह में संग एडियाँ छिलने भी दो.
***************************

दोस्त से ही शिकवा-शिकायत क्यों है?
दोस्त को ही हमसे अदावत क्यों है?
थाम लो हाथ तो ये दिल भी मिल ही जायेंगे-
ब ही पूछेंगे 'सलिल' हममें सखावत क्यों है?
*******************************************





No comments:

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...