Friday, March 20, 2009

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गीतिका

तुम

संजीव 'सलिल'

सारी रात जगाते हो तुम.

नज़र न फिर भी आते हो तुम.

थक कर आँखें बंद करुँ तो-

सपनों में मिल जाते हो तुम.

पहले मुझ से आँख चुराते,

फिर क्यों आँख मिलाते हो तुम?

रूठ मौन हो कभी छिप रहे,

कभी गीत नव गाते हो तुम

'सलिल' बांह में कभी लजाते,

कभी दूर हो जाते हो तुम.

नटवर नटनागर छलिया से,

नचते नाच नचाते हो तुम

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1 comment:

  1. संजीव जी सच जब-जब आपको पढ़ता हूँ तो एक अलग अहसास होता है
    बहुत बढ़िया

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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