Wednesday, November 15, 2017

हास्य व्यंग के इंटरनेशनल शायर हिलाल स्योहारवी

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ जिनकी आज पंचवीं पुण्य तिथि है हास्य व्यंग के इंटरनेशनल शायर हिलाल स्योहारवी अपनी शायरी से कहकहे लगवाते हुए नेताओं और व्यवस्था पर चोट करने वाले हिलाल स्योहारवी की आज पुण्यतिथि है। उनहोंने हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी शायरी की छाप छोड़ी। न तुम संभले तो फिर नया तूफान आयेगा। मदद को राम आएंगे न फिर रहमान आएगा। जैसे शेर ने माध्यम से समाज को आगाह करने वाले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर हिलाल स्योहारवी का वास्तविक नाम हबीबुर्रहमान था। शायरी में आने के बाद उन्होंने अपना उपनाम हिलाल जिसका अर्थ होता है चांद रख लिया। १५ नवंबर २०१२ को उनकी मृत्यु हुई थी। अपनी धमाकेदार नज्मों और कतात के लिए लोग उन्हें आज भी उन्हें याद करते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मौत पर इनके इस कता ने बहुत ख्याति पाई - बजा कहा जो शहीदाने वतन कहा तुझको, ये हैसीयत तुझे दुनिया में नाम करके मिली। अब इससे बढ़के तेरा एहतराम क्या होगा, मिली जो मौत भी तुझको सलाम करके मिली। हिलाल स्योहरवी को गालिब इंस्टीट्यूट नई दिल्ली में उपराष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा द्वारा उर्दू अदब की सेवा के लिए वर्ष १९८७-८८ का तंजोमिजहा एवार्ड देकर सम्मानित किया गया। हिलाल ने अपनी शायरी से जहां महफिलों में कहकहे लगवाये वहीं नेताओं, व्यवस्था, राजनीति, सांप्रदायिकता, पूंजीवाद पर चोट करने से कभी नहीं चूके। उनका कता यह कता ऐ बानगी है - गरीबी को मिटा देने की बातें सिर्फ बातें हैं, जो खुद दौलत के भूखें हो गरीबी क्या मिटाएंगे, गरीबों का लहू तो आपकी कारों का डीजल है गरीबी मिट गई तो आप क्या रिक्क्षा चलाऐंगे। उनकी शायरी की बात ही कुछ ऐसी थी कि चीन से जंग के समय खून की मांग हो या संसद में जूते चलने की घटना, प्रधानमंत्री राजीव गांधी का २१वीं सदी में जाने का सपना हो या बेनजीर भुट्टो का पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने का अवसर, राजीव गांधी की मौत हो राकेश शर्मा का अंतरिक्ष में जाना हर घटना पर मीडिया की सुर्खी हिलाल स्योहरवी की शायरी में से ही आती रही हैै। राजीव गांधी के प्रधान मंत्री बनने पर उन्होंने यह कता पढ़ा- रक्स होता है तेरी किस्मत पर, क्या तेरे हाथ को लकीर मिली। और तो सब नियामतें मिली थी तुझे अब पड़ौसन भी बेनजीर मिली। राकेश शर्मा के चांद पर जाने के बाद उन्होंने कहा- फिर कोई समझा ही नहीं इस खूबसूरत तंज को, मुझको तो राकेश शर्मा का बयां अच्छा लगा। उन से जब पूछा गया कैसा लगा हिंदोस्तां, हंस के बोले दूर से हिंदोस्तां अच्छा लगा। एक मजदूर के रूप में अपना जीवन शुरू करने वाले हिलाल स्योहरवी ने मजदूरों के दुख दर्द और तकलीफों को बड़े नजदीक से देखा। फिर उसे शायरी का रूप देकर तंजोमिजहा की चाशनी में डुबो कर दुनिया के सामने इस ढ़ंग से प्रस्तुत किया कि कड़वी बातें भी मिठास के साथ दिल की गहराईयों में उतर जाऐं। उन्होंने कहा कि सभी कहते हैं पूंजीपति हैं मगरूर, काम आते हैं एलेक्षन में यही लोग हजूर। दोस्ती आज के जरदार से रखनी है जरूर, अब रहे वो जो हैं भारत में परेशां मजदूर। चाहते उनका भला हम भी नहीं तुम भी नहीं, आओ मिल जाऐं खफा हम भी नहीं तुम भी नहीं। हिलाल स्योहारवी शायर तो थे ही वे एक विचारक और एक दार्शनिक भी थे। उन्होने अपनी शायरी से सोई हुई व्यवस्था को झकझोरा, उसकी खामियों को उजागर किया। उन्होने कहा कि तुम अपनी गरीबी को मिटाते नहीं खुद ही, क्या -क्या न मिला तुम को सहारा नहीं समझे। हर शहर में मुद्दत से है रातों को अंधेरा, तुम लोग सियासत का इशारा नहीं समझे। हिलाल स्योहारवी की एक नजम मेरा हिंदोस्तां यहां मौसम सलौने और सुहाने, हिमालय बर्फ की चादर है ताने, नदी नाले सुनाते हैं तराने, जमां अपनी उगलती है खजाने, इसी धरती पे जन्नत का गुमां है। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।। पदक सोने का कोई मुल्क पाले, कोई फुटबॉल कितना ही उछाले, कोई तैराक सौ तमगे लगाले, यहां के खेल भी सबसे निराले, एलेक्षन में जो जीते पहलवां है। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।। यहां नाचो विदेशी साजिशों पर, कहीं दो जाके धरना दफ्तरों पर, करो पथराव सरकारी बसों पर, सफर करो ट्रेनों की छतों पर, हिफाजत के लिए अल्लाहमियां है। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।। यहां फरसूदा रस्मों को हवा दो, चिता की गोद में अबला बिठा दो, कहीं आईन सड़कों पर जला दो, किसी नेता पे कुछ तौहमत लगा दो, कलम अपना है अपनी जुबां हैं। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।। कोई जाकर कहीं फितना जगा दे, मुहब्बत के जो रिश्तें हैं मिटा दे, कोई इतिहास के पन्ने उड़ा दे, कोई मंदिर को मस्जिद से लड़ा दे, सियासत में मजहब दरमियां है। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।। डोनेशन हो तो बच्चों को पढ़ा लो, जो रिश्वत हो फांसी से छुड़ा लो, जो पैसे हों तो परमीट घर मंगालो, मिले दौलत वतन को बेच डालो, मगर छोड़ो ये लम्बी दास्तां है। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।। न इसको देख पायी कम निगाही, उजालों के जो पीछे है सियाही, यहां एक जुर्म भी है बेगुनाही, मिसेज गांधी के खूं से लो गवाही, वो ही कातिल है वो ही पासबां है। ये भारत है मेरा हिंदोस्तां है।।डा. वीरेंद्र

Saturday, September 16, 2017

लो क सं घ र्ष !: काँग्रेस मठाधीश ने अपने प्यादोँ से प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को घेरा





उत्तर प्रदेश मेँ निष्प्राण पडी काँग्रेस मेँ प्रत्यक्ष या परोक्ष कब्जेदारी को लेकर अभी भी घात प्रतिघात जारी हैँ और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष फिलहाल इन चालोँ मेँ फँसते दिखाई दे रहे हैँ ।
ऊपरी तौर पर अभी उत्तर प्रदेश काँग्रेस मेँ भले अभी सब ठीक ठाक दिखाई दे रहा हो लेकिन पर्दे के पीछे तलवारेँ भाँजे जाने की शुरूआत हो चुकी है , वजह है काँग्रेस हाईकमान की निगाह मेँ काफी दिनोँ से सँदिग्ध और अपनी सीट बचाने के लिए काँग्रेस की दर्जनोँ सीटेँ समाजवादी पार्टी के हाथ गिरवीँ रखने वाला एक चर्चित मठाधीश बाकी क्षत्रपोँ को प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को अपने प्यादोँ के जरिए अपनी घेरेबन्दी मेँ कामयाब होता दिखाई दे रहा है ।


दर असल वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश मेँ खुद से जुडे कार्यकर्ताओँ की सँख्या के लिहाज से निप्स अकेले हैँ । उनके साथ केवल एक कार्यकर्ता है जो कानपुर का युवा व्यवसाई और साधनसम्पन्न व्यक्ति है लेकिन राजनीतिक समझ और जमीनी पकड के लिहाज से शून्य है , चर्चा है कि राजबब्बर को सँसाधन वही उपलब्ध करवा रहा है और राजबब्बर की राजनीतिक हैसियत का उसी अनुपात मेँ लाभ उठा रहा है । उसकी यह कार्यशैली आमतौर पर प्रदेश काँग्रेस कमेटी मेँ बैठने वालोँ को अखर रही है लेकिन राजबब्बर की राहुल गाँधी पर मजबूत पकड के चलते ये पीसीसी ब्राँड काँग्रेसजन खुद को मजबूर पा रहे हैँ । इसका पूरा फायदा हाईकमान की निगाह मेँ सँदिग्ध उस शातिर मठाधीश ने उठाया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री के कार्यकाल मेँ पीसीसी मेँ घुसेडे गए अपने प्यादोँ के जरिए वर्तमान अध्यक्ष को पूरी तरह से अपने घेरे मेँ ले लिया ।

इस लिहाज से अगर यह कहा जाए कि वर्तमान अध्यक्ष दिखाने के अध्यक्ष तो खुद हैँ लेकिन पर्दे के पीछे से काँग्रेस की बागडोर उस मठाधीश ने थाम रखी है ।


अब स्थिति यह है कि उस मठाधीश की पकड से राजबब्बर को निकालने के लिए गोलबँदी का दौर शुरू हो चुका है और इस विपक्षी लाबी का कहना है कि राजबब्बर ने उस मठाधीश के प्यादोँ के घेरे से खुद को बाहर ना निकाला तो 2019 मेँ काँग्रेस भाजपा से नहीँ आपस मेँ ही लडती दिखाई देगी ।


इतने दिनोँ तक बाकी क्षत्रप तो चुप रहकर मौके का इँतजार कर रहे थे लेकिन विगत 13 सितँबर को इन्दिरा गाँधी जन्मशती समारोह मेँ राजबब्बर ने यह मौका खुद बाकी मठाधीशोँ को सौप दिया जब इस समारोह का मीडिया सँयोजन प्रदेश काँग्रेस के मीडिया प्रमुख व पूर्वमँत्री सत्यदेव त्रिपाठी की जगह उस मठाधीश की विधायक बेटी व एक अपने एक अन्य प्यादे के हाथ मेँ दिलवा दिया । तिहत्तर वर्षीय सँघर्षशील नेता सत्यदेव त्रिपाठी के लिए यह बडा आघात था और इससे आहत होकर उन्होने त्यागपत्र देने का मन बना लिया था । किन्तु यह बात फैलते ही बाकी क्षत्रप और अन्य उपेक्षित काँग्रेसी सत्यदेव त्रिपाठी के इर्दगिर्द इकट्ठा होने लगे और उन पर इस्तीफा ना देकर काँग्रेस के हित मेँ तन कर खडे होने का दबाव बनाया और वे इसमेँ कामयाब भी हुए ।


-भूपिंदर पाल सिंह

Wednesday, November 2, 2016

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास




आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता
कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में ले जाकर फर्जी
मुठभेड़ दिखाकर हत्या कर दी उस मुठभेड़ को सही साबित करने के लिए
आश्चर्यजनक परिस्थितियों में जेल वार्डन रमाशंकर यादव की हत्या कर दी जाती
हैं यह सभी कार्य राजनीतिक नेतृत्व के सम्भव नहीं है
दिल्ली में सीबीआई वरिष्ठ अधिकारी बंसल को गिरफ्तार
करती है और उस घटना में पहले बंसल की बेटी और पत्नी आत्महत्या कर लेती है
और बाद में बंसल और उनका पुत्र भी
आत्महत्या कर लेता है सीबीआई केन्द्र सरकार की इच्छा शक्ति को प्रदर्शित
करती है और अधिकारियों को यह संदेश देती है कि अगर हमारे राजनीतिक इशारों
के अनुसार कार्य नहीं करोगे तो यातना गृह में पूरे परिवार को तडपा तडपा कर
मार डाला जायेगा। यह सब मामले नाजी
जर्मनी की याद दिलाते हैं और
हिटलर का गेस्टापो   जर्मनी में कवि लेखक पत्रकार
न्यायविद व यहूदी लोगों को उठा ले जाते थे यातनागृहो में मार डालने का
कार्य करते थे और अगर कोई व्यक्ति किसी जेल में होता था तो उसको कैदियों
द्वारा पीटने के नाम पर उसकी हत्या कर दी जाती थी। कतील नाम के मुस्लिम
नौजवान की हत्या जेल में कर दी जाती जब उसके केस का फैसला आने वाला होता
है। उसी तर्ज पर जब इन सिमी कार्यकर्ताओं का फैसला आने वाला था तो जाकिर
हुसैन सादिक, मोहम्मद सलीक, महबूब गुड्डू, मोहम्मद खालिद अहमद, अकील अमजद,
शेख मुजीब और मजीद की हत्
या कारागार से निकाल कर कर दी जाती है।

                                                             वही   उत्तर प्रदेश की राजधानी
लखनऊ में उक्त हत्या कांड  के विरोध प्रदर्शन  में पुलिस ने नागरिक संगठन रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव की बुरी
तरह पिटाई की है. पुलिस राजीव को पीटते हुए जीपीओ पुलिस चौकी ले गई, जहां
तबीयत बिगड़ने पर ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया.


                                  राजीव के अलावा मंच के
शकील कुरैशी भी ज़ख़्मी हैं. मंच ने सोमवार को भोपाल में हुए सिमी एनकाउंटर
और उसमें पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए लखनऊ, जीपीओ पर विरोध
प्रदर्शन बुलाया था जहां पुलिस ने उनपर कार्रवाई की.   रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब अधिवक्ता ने कहा है कि
मध्यप्रदेश
की भाजपा सरकार ने उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार से कोई अंदरुनी गठजोड़
कर रखा है?जिसका परिणाम   लाठी चार्ज है यह भी सरकारी हत्या का प्रयास है
जो भी विरोध करेगा  उसका भी यही अंजाम होगा




                          देश बदल रहा है देश को यातना गृह और हत्या घर में बदला
जा रहा है न्यायपालिका चिल्ला रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति न कर
न्यायालयों में ताला लगाने की साजिश है राजनीतिक नेतृत्व हिटलर के फासीवाद
से प्रतीत है उससे कोई उम्मीद करना बेइमानी होगी जरूरत इस बात की है कि
धर्मनिरपेक्ष, जनवादी कार्पोरेट विरोधी शक्तियों को अपनी ताकत से विरोध
करने की है भोपाल फर्जी मुठभेड़ प्रकरण की अविलंब जाच उच्चतम न्यायालय के
न्यायाधीश इस बिंदु पर कराने की आवश्यकता है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व की
इस फर्जी मुठभेड़ प्रकरण में कहा तक शामिल था 


----रण धीर सिंह सुमन 

                          एडवोकेट

 लो क सं घ र्ष !

Thursday, September 15, 2016

शहाबुद्दीन ने जिस पिता के बेटों को तेजाब में जलाकर मारा उस पिता की दर्द भरी कहानी.

सीवान शहर में मेरी दो दुकानें थीं. एक किराने की और दूसरी परचून की. समृद्ध और संपन्न न भी कहें तो कम से कम खाने-पीने की कमाई तो होती ही थी. मैं छह संतानों का पिता था. चार बेटे, दो बेटियां. मैं उस दिन किसी काम से पटना गया हुआ था. अपने भाई के पास रुका हुआ था. मेरे भाई पटना में रिजर्व बैंक में अधिकारी थे. सीवान शहर में मेरी दोनों दुकानें खुली हुई थीं. एक पर सतीश बैठता था, दूसरे पर गिरीश. मेरे पटना जाने के पहले मुझसे दो लाख रुपये की रंगदारी मांगी जा चुकी थी. उस रोज किराने की दुकान पर डालडे से लदी हुई गाड़ी आई हुई थी.
दुकान पर 2.5 लाख रुपये जुटाकर रखे थे. रंगदारी मांगने वाले फिर पहुंचे. दुकान पर सतीश था. सतीश ने कहा कि खर्चा-पानी के लिए 30-40 हजार देना हो तो दे देंगे, दो लाख रुपये कहां से देंगे. रंगदारी वसूलने आए लोग ज्यादा थे. उनके हाथों में हथियार थे. उन लोगों ने सतीश के साथ मारपीट शुरू की, गद्दी में रखे हुए 2.5 लाख रुपये ले लिए. राजीव यह सब देख रहा था. वह घर में गया. आम लोगों के पास घर में कौन सा हथियार होता है , बाथरूम साफ करने वाला तेजाब रखा हुआ था. मग में उड़ेलकर लाया, भाई को गुंडों से बचाने के लिए गुस्से में उसने तेजाब फेंक दिया जो रंगदारी वसूलने आए कुछ लोगों पर पड़ गया. तेजाब के छीटें मेरे बेटे राजीव पर भी आए. भगदड़ मच गई, अफरातफरी का माहौल बन गया.
इसके बाद उन लोगों ने सतीश को पकड़ लिया. राजीव भागकर छुप गया. फिर मेरी दुकान को लूटा गया. जो बाकी बचा उसमें पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी गई. गिरीश दूसरी दुकान पर था. उसे इन बातों की कोई जानकारी नहीं थी. कुछ देर बाद उसके पास भी कुछ लोग पहुंचे और उसे भी उठाकर ले गए।
थोड़ी देर में राजीव को भी ले गए, तीनों बेटे उनके कब्ज़े में थे। राजीव को बाँध दिया गया। राजीव की आंखों के सामने उसके छोटे भाइयों सतीश और गिरीश को तेजाब से जलाकर मार डाला गया. तेजाब से नहलाते वक्त वे लोग कहते रहे कि राजीव को अभी नहीं मारेंगे, इसे दूसरे तरीके से मारेंगे. सतीश और गिरीश को जलाने के बाद उन्हें कसाइयों की तरह काटा गया, फिर उनके शव पर नमक डालकर बोरे में भरकर फेंक दिया गया.
मैं पटना में था मुझे फोन आया कि आपके दोनों बेटों को मार दिए हैं तीसरा मेरे कब्जे में है इसलिए सीवान में अभी नहीं आना। धमकी के बाद मैं पटना में रुक गया। तीसरा बेटा अकेला उनके कब्जे में था।
दो दिनों बाद राजीव वहां से भागने में सफल रहा. गन्ने से लदे एक ट्रैक्टर से राजीव चैनपुर के पास उतर गया, फिर वहां से उत्तर प्रदेश के पड़रौना पहुंचा. राजीव वहीँ छुप गया। इस बीच मुझे झूठी खबर दी गयी पटना में ही कि राजीव छत से गिरकर pmch अस्पताल में भर्ती है, जल्दी से आ जाओ। असल में मुझे उस अस्पताल में ही बुलाकर मारने का प्लान बना लिया गया था।
पर मैं समझ गया था इसलिए हिम्मत जुटाकर सीवान गया. वहां जाकर एसपी से मिलना चाहा. एसपी से नहीं मिलने दिया गया. थाने पर दारोगा से मिला. दारोगा ने कहा कि अंदर जाइए पहले. फिर कहा गया कि आप इधर का गाड़ी पकड़ लीजिए, चाहे उधर का पकड़ लीजिए, किधर भी जाइए लेकिन सीवान में मत रहिए. सीवान में रहिएगा तो आपसे ज्यादा खतरा हम लोगों पर है. पूरा प्रशासन खुद डर से काँप रहा था।
मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया था. अब तक मेरे बेटे राजीव के बारे में कुछ भी नहीं पता चला था कि वह जिंदा भी है या नहीं. है भी तो कहां है. मेरी पत्नी-बेटी और मेरा एक विकलांग बेटा कहां रह रहा है, वह भी नहीं पता था. मैं डर से पटना ही रहने लगा. साधु की तरह दाढ़ी-बाल बढ़ गए.
किसी तरह भीड़ में घुस कर नेताजी (शायद लालू) से मिला तो वो भड़क गए, बोले सीवान का कंप्लेन करने तू सोनपुर कैसे आ गया। फिर ऐन दिल्ली चला गया कि सोनिया गांधी से मिलूंगा। राहुल जी मिले, उन्होंने कहा कि आप जाइए, बिहार में राष्ट्रपति शासन लगने वाला है, आपकी मुश्किलों का हल निकलेगा. फिर हिम्मत जुटाकर सीवान आया. दिल्ली भी फेल हो गयी थी।
मैंने एएसपी साहब से चिट्ठी देने जाना था, कुछ लोगों को साथ चलने को कहा, सभी ने कहा नहीं हमें तुम्हारे साथ जाते देख लिया तो मरना तय है। फिर मैं अँधेरे मुंह सुबह में पांच बजे छुपते हुए एसएसपी के आवास पहुंचा। सुरक्षाबलों से बहुत कहने के बाद लुंगी-गंजी (बनियान) में एसपी साहब आए. मैंने कहा कि सुरक्षा चाहिए, यह चिट्ठी है. एसपी साहब ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए, सीवान अब आपके लिए नहीं है. चाहे तो यूपी चले जाइए या कहीं और. ये भी शहाबुद्दीन के राज में उसके आदमी निकले।
अब मैंने तय कर लिया कि सीवान में ही रहूँगा। कहाँ भागता फिरूँ ? डीआईजी साहब ने मदद की. उन्होंने एसपी साहब से कहा कि इन्हें सुरक्षा दीजिए, अगर आपके पास जिले में बीएमपी के जवान नहीं हैं तो मैं दूंगा लेकिन इन्हें सुरक्षा दीजिए. फिर मैं वहीँ रहने लगा, एक जीवित बचा बेटा राजीव लौट आया तो जीने की उम्मीद जागी। बेटे राजीव की शादी की.
शादी के सिर्फ 18वें ही दिन और मामले में गवाही के ठीक तीन दिन पहले उसे मार दिया गया. मेरा बेटा राजीव चश्मदीद गवाह था. मेरा बेटा राजीव इसके पहले भी कोर्ट में अपना बयान देने गया था. जिस दिन बयान देने गया था उस दिन भी उसे कहा गया था, ‘हमनी के बियाह भी कराईल सन आउरी श्राद्ध भी.’
जब गवाह ही नहीं बचते तो रिहाई होनी ही थी। मेरी आमदनी सिर्फ 6 हज़ार रुपये है। बीमार पत्नी और बाकी विकलांग लोगों का खर्च इसी में चलता है। शहाबुद्दीन ने हँसते खेलते परिवार को उजाड़ दिया। मैं अकेला नहीं हूँ, ऐसी कहानी के भुक्तभोगी अनगिनत हैं। ये बिहार है।
(एक पिता की जुबानी)
लानत है ऐसे सिस्टम पर .... न्याय पालिका पर ...सरकार पर ...नेताओ पर ..... क्या किसी को भी इन बूढ़े माँ बाप का दर्द नहीं दिखा 3जवान बेटो की मौत के बाद कौन जीना चाहेगा।

Tuesday, March 8, 2016

वीर सावरकर का भरी संसद में अपमान।

वीर सावरकर एक हिंदुत्ववादी नेता, राजनैतिक चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका पूरा नाम
विनायक दामोदर सावरकर था। सावरकर पहले स्वतंत्रता सेनानी व राजनेता थे जिसने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। विनायक दामोदर सावरकर ने ̔अभिनव भारत सोसाइटी ̕का गठन किया और बाद में स्वदेशी आंदोलन का भी हिस्सा बने। कुछ समय बाद वह तिलक के साथ ̔स्वराज दल ̕में शामिल हो गए।

उनके देश भक्ति से ओप-प्रोत भाषण और स्वतंत्रता आंदोलन के गतिविधियों के कारण
अंग्रेज सरकारने उनकी स्नातक की डिग्री ज़ब्त कर ली थी। वर्ष 1906 जून में बैरिस्टर बनने के लिए वे इंग्लैंड चले गए और वहां भारतीय छात्रों को

भारत में हो रहे ब्रिटिश शासन के विरोध में एक जुट किया। उन्होंने वहीं पर ̔आजाद भारत सोसाइटी का गठन किया। सावरकर ने अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए हथियारों के इस्तेमाल की वकालत की थी और इंग्लैंड में ही हथियारों से लैस एक दल तैयार किया था।

सावरकर द्वारा लिखे गए लेख ̔इंडियन सोशियोलाजिस्ट̕’ और ̔तलवार’̕ नामक पत्रिका में प्रकाशित होते थे। वे ऐसे लेखक थे जिनकी रचना के प्रकाशित होने के पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसी दौरान उनकी पुस्तक ̔द इंडियन वार ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857’ तैयार हो चुकी थी परंतु ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन और भारत में उसके प्रकाशित होने पर रोक लगा दी।

कुछ समय बाद उनकी रचना मैडम भीकाजी कामा̕की मदद से हॉलैंड में गुपचुप तरीके से प्रकाशित हुयी और इसकी प्रतियां फ्रांस पहुंची और फिर भारत भी पहुंचा दी गयीं। सावरकर ने इस पुस्तक में 1857 के ̔सिपाही विद्रोह' को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली लड़ाई बताया था।

सावरकर को 13 मार्च 1910 को लंदन में कैद कर लिया गया। अदालत में उनपर गंभीर आरोप लगाये गए, और 50 साल की सजा सुनाई गयी। उनको काला पानी की सज़ा देकर अंडमान के सेलुलर जेलभेज दिया गया और लगभग 14 साल के बाद रिहा कर दिया गया। वहां पर उन्होंने कील और कोयले से कविताएं लिखीं। दस हजार पंक्तियों की कविता को जेल से छूटने के बाद उन्होंने दोबारा लिखा।

उनके द्वारा ही तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया गया था। आजादी के बाद उनको 8 अक्टूबर 1951 में उनको पुणे विश्वविद्यालयन ने डी.लिट की  उपाधि दी। 1 फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया था।
26 फरवरी 1966 को उन्होंने मुम्बई में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया और चिर निद्रा में लीन हो गए।

ऐसे क्रांतिकारी जो अपने पुरे जीवन काल मे अंग्रेजोंके खिलाफ लढे, जिनके बारे मे राहुल ने भरी सभा मे कहा कि "अगर सावरकर को आपने फेक दिया तो अच्छा किया" |

Monday, February 22, 2016

रवीश शायद सबसे जायदा आप डरे हुए है।

रवीश का ये आंदोलन अपने तरह का आंदोलन है जो हिडन पालिसी के तहत है लेकिन है जेएनयू और वामपंथ के समर्थन में ही। इन्हें सुधीर चौधरी के डीएनए से दिक्कत है क्योंकि डीएनए को देखने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग तैयार हो चूका है। और डीएनए वामपंथ और राष्ट्रविरोधी तत्वों का पुरजोर विरोध कर रहा है। चाहे वो कश्मीरी पंडितों को लेकर जमीनी स्तर पर की गयी पत्रकारिता हो या कोई और मुद्दा। जेएनयू का किस्सा भी उन कश्मीर पंडितों की कहानी से जुड़ा मुद्दा ही है। सुधीर ने इस मुद्दे को बड़ी ही बारीकी से दर्शकों तक पहुँचाया है,इसलिए सुधीर चौधरी के विरोध कश्मीर की आज़ादी चाहने वालों का पहला उद्देश्य है।

रवीश ने जेएनयू से जुड़े सभी वीडियो को फ़र्ज़ी ठहरा दिया,जेएनयू का विरोध का कर रहे सभी लोगों के स्टेटमेंट को गलत बताकर उन्हें गलत और पकिस्तान ज़िंदाबाद को सही ठहरा दिया। हो सकता है बीजेपी से जुड़े लोगों ने विरोध में उन शब्दों का चयन किया जो सही नहीं थे,लेकिन ये कतई नहीं है की ऐसा होना से उमर खालिद और कन्हैया बेगुनाह साबित हो जायेंगे। आप कहते है आपकी देशभक्ति को सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है,बताएंगे आखिरी बार देश का विरोध करने वालों का आपने कब विरोध किया था? आप देश भक्त है यह बस आपके मुँह से सुनने मिलता है,साबित करके तो आपने बस यह दिखाया है की आप पाकिस्तान के समर्थकों के बचाव के लिए किसी भी हद तक जा सकते है।

सुधीर चौधरी को छोड़ दीजिये,इस बार तो अर्णब गोस्वामी भी आपके लिए एक सभ्य और निस्पक्ष पत्रकार नहीं लगा होगा क्योंकि वो जेएनयू की गतिविधियों के खिलाफ लगातार लड़ रहा है,और ऐसा करने वाले आपकी नजरों में अच्छे तो हो ही नहीं सकते। इस केस में आपने तो असल देशभक्ति दिखने वालों को ही दोषी ठहरा दिया है,आपके पास जो मंच है आपने उसका भरपूर उपयोग किया है वामपंथ के समर्थन के लिए। और यकीन कीजिये आप लोगों के ब्रेनवाश करने में काफी हद तक कामयाब भी रहे है। अब वो दोषी नही है जिन्होंने पाकिस्तान को ज़िंदाबाद किया,बल्कि विरोध करने वाले दोषी है क्योंकि उन्होंने विरोध के लिए शब्दों का चयन गलत किया।

जिस तरह से आपका समर्थन करने वाले दूसरों को भक्त कहते फिरते है तो मुबारक हो आपने भी अपने लिए कई भक्त पैदा कर लिए है,जो आपकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। आपकी काली नीली स्क्रीन पर आपकी आवाज़ सुनकर ही लाल सलाम..लाल सलाम चिल्लाने लगेंगे। और यकीन मानिए कांग्रेस,आप और वामपंथियों के लिए आपने काली स्क्रीन करके वो कर दिया है जो पिछले 15 दिनों से ये सब मिलकर नहीं कर पा रहे थे,शायद इसलिए इन सबने मिलकर आपका सहारा लिया। उम्मीद है आप इसी तरह इन्हें मजबूत करते रहेंगे बस मेहरवानी कीजिये देशभक्ति और देशहित जैसे शब्दों का इस्तेमाल मत कीजिये। आप सबसे जायदा डरे हुए है रवीश,क्योंकि देश को तोड़ने वालों के खिलाफ देश एक जुट हो रहा है।

संजय सेन सागर

रवीश वामपंथ की आवाज़ है।

रवीश का ये आंदोलन अपने तरह का आंदोलन है जो हिडन पालिसी के तहत है लेकिन है जेएनयू और वामपंथ के समर्थन में ही। इन्हें सुधीर चौधरी के डीएनए से दिक्कत है क्योंकि डीएनए को देखने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग तैयार हो चूका है। और डीएनए वामपंथ और राष्ट्रविरोधी तत्वों का पुरजोर विरोध कर रहा है। चाहे वो कश्मीरी पंडितों को लेकर जमीनी स्तर पर की गयी पत्रकारिता हो या कोई और मुद्दा। जेएनयू का किस्सा भी उन कश्मीर पंडितों की कहानी से जुड़ा मुद्दा ही है। सुधीर ने इस मुद्दे को बड़ी ही बारीकी से दर्शकों तक पहुँचाया है,इसलिए सुधीर चौधरी के विरोध कश्मीर की आज़ादी चाहने वालों का पहला उद्देश्य है।

रवीश ने जेएनयू से जुड़े सभी वीडियो को फ़र्ज़ी ठहरा दिया,जेएनयू का विरोध का कर रहे सभी लोगों के स्टेटमेंट को गलत बताकर उन्हें गलत और पकिस्तान ज़िंदाबाद को सही ठहरा दिया। हो सकता है बीजेपी से जुड़े लोगों ने विरोध में उन शब्दों का चयन किया जो सही नहीं थे,लेकिन ये कतई नहीं है की ऐसा होना से उमर खालिद और कन्हैया बेगुनाह साबित हो जायेंगे। आप कहते है आपकी देशभक्ति को सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है,बताएंगे आखिरी बार देश का विरोध करने वालों का आपने कब विरोध किया था? आप देश भक्त है यह बस आपके मुँह से सुनने मिलता है,साबित करके तो आपने बस यह दिखाया है की आप पाकिस्तान के समर्थकों के बचाव के लिए किसी भी हद तक जा सकते है।

सुधीर चौधरी को छोड़ दीजिये,इस बार तो अर्णब गोस्वामी भी आपके लिए एक सभ्य और निस्पक्ष पत्रकार नहीं लगा होगा क्योंकि वो जेएनयू की गतिविधियों के खिलाफ लगातार लड़ रहा है,और ऐसा करने वाले आपकी नजरों में अच्छे तो हो ही नहीं सकते। इस केस में आपने तो असल देशभक्ति दिखने वालों को ही दोषी ठहरा दिया है,आपके पास जो मंच है आपने उसका भरपूर उपयोग किया है वामपंथ के समर्थन के लिए। और यकीन कीजिये आप लोगों के ब्रेनवाश करने में काफी हद तक कामयाब भी रहे है। अब वो दोषी नही है जिन्होंने पाकिस्तान को ज़िंदाबाद किया,बल्कि विरोध करने वाले दोषी है क्योंकि उन्होंने विरोध के लिए शब्दों का चयन गलत किया।

जिस तरह से आपका समर्थन करने वाले दूसरों को भक्त कहते फिरते है तो मुबारक हो आपने भी अपने लिए कई भक्त पैदा कर लिए है,जो आपकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। आपकी काली नीली स्क्रीन पर आपकी आवाज़ सुनकर ही लाल सलाम..लाल सलाम चिल्लाने लगेंगे। और यकीन मानिए कांग्रेस,आप और वामपंथियों के लिए आपने काली स्क्रीन करके वो कर दिया है जो पिछले 15 दिनों से ये सब मिलकर नहीं कर पा रहे थे,शायद इसलिए इन सबने मिलकर आपका सहारा लिया। उम्मीद है आप इसी तरह इन्हें मजबूत करते रहेंगे बस मेहरवानी कीजिये देशभक्ति और देशहित जैसे शब्दों का इस्तेमाल मत कीजिये। आप सबसे जायदा डरे हुए है रवीश,क्योंकि देश को तोड़ने वालों के खिलाफ देश एक जुट हो रहा है।

संजय सेन सागर